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दबंग ईओ की विदाई… आँसू भी, मुस्कान भी और किस्से भी बेहिसाब : हर जुबां पर एक ही नाम था— भूपेंद्र प्रकाश जोशी।

Abid Hussain

Fri, Apr 3, 2026

दबंग ईओ की विदाई… आँसू भी, मुस्कान भी और किस्से भी बेहिसाब

टनकपुर/चम्पावत।

विकास भवन का माहौल कुछ अलग ही था—

कहीं तालियाँ गूंज रहीं थीं, कहीं आंखें नम थीं,

और हर जुबां पर एक ही नाम था— भूपेंद्र प्रकाश जोशी।

सेवानिवृत्ति का मौका था, मगर यह कोई साधारण विदाई नहीं थी,

यह उस अफसर की रुखसती थी जिसने फाइलों में नहीं,

मैदान में उतरकर काम किया… और नाम कमाया।

“जो डर के जीते हैं, वो क्या काम करेंगे,

जोशी साहब तो वो थे, जो दबाव में भी मुस्कुराकर सिस्टम संभालते रहे।”

1989 से शुरू हुआ सफर चमोली की वादियों से निकला,

पिथौरागढ़ की राहों से गुजरता हुआ चम्पावत और टनकपुर तक पहुंचा,

और हर जगह एक ही कहानी छोड़ गया—

काम बोलता है, अफसर नहीं।

जब 2021 में ईओ की कुर्सी मिली,

तो कुर्सी नहीं बदली, काम का तरीका भी नहीं बदला—

बस रफ्तार तेज हो गई।

सड़कों पर रोशनी आई,

चौराहों ने सजना सीखा,

सफाई ने सिस्टम पकड़ा,

और कर्मचारियों ने वक्त पर वेतन पाना।

“कागजों में नहीं, सड़कों पर दिखता था उनका असर,

जोशी साहब थे तो शहर भी लगता था बेहतर।”

बाढ़ आई तो दफ्तर में नहीं बैठे,

बल्कि गलियों में उतरे, लोगों के बीच पहुंचे,

और साबित किया कि—

अफसर वही, जो मुश्किल में सबसे आगे दिखे।

राजनीतिक दबाव भी आए,

पर वो ठहरे जोशी—

ना झुके, ना रुके, बस काम करते रहे।

“सच की राह पर कांटे बहुत थे, मगर कदम नहीं डगमगाए,

ईमानदारी की लौ ऐसी जली, कि कई चेहरे भी झुक जाए।”

विदाई समारोह में हर कोई भावुक था—

पर माहौल में एक अपनापन भी था,

जहां सम्मान भी था और हंसी-मजाक भी।

किसी ने कहा—

“साहब जैसे लोग सिस्टम में कम होते हैं,

वरना फाइलें तो बहुत चलती हैं, काम कम होता है।”

तो किसी ने मुस्कुराते हुए जोड़ा—

“अब टनकपुर को भी आदत डालनी पड़ेगी… बिना दबंग ईओ के।”

अंत में बस यही दुआ—

“रिटायरमेंट एक पड़ाव है, सफर का अंत नहीं,

जोशी साहब जैसे लोग कहीं भी रहें, असर कम नहीं।”

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दमदार मिसाल

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